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चीखता रहा पीड़ित पिता, नदारद रहे अफसर; कलेक्ट्रेट में गूंजे मुर्दाबाद के नारे, क्या सड़कों पर उतरकर ही मिलेगा न्याय•••? कागजों पर फिटनेस, सड़कों पर काल! परिवहन विभाग की लापरवाही ने ली 4 वर्षीय अनय की जान, कब थमेगा 'कमीशन' का यह खूनी खेल••?

सोमवार, 18 मई 2026

चीखता रहा पीड़ित पिता, नदारद रहे अफसर; कलेक्ट्रेट में गूंजे मुर्दाबाद के नारे, क्या सड़कों पर उतरकर ही मिलेगा न्याय•••? 

कागजों पर फिटनेस, सड़कों पर काल! परिवहन विभाग की लापरवाही ने ली 4 वर्षीय अनय की जान, कब थमेगा 'कमीशन' का यह खूनी खेल••?



शिवपुरी। इंटरसिटी वीडियो कोच बस में जिंदा जले 4 वर्षीय मासूम अनय जैन की मौत ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। इस रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसे के बाद अब जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है। सोमवार को आसमान से बरसती आग और चिलचिलाती धूप की परवाह किए बिना मासूम को न्याय दिलाने के लिए शहरवासी और तीन विधायक सड़कों पर उतर आए। आक्रोशित भीड़ ने कलेक्ट्रेट का घेराव कर प्रशासनिक सुस्ती और पुलिसिया रवैये के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। यह प्रदर्शन सिर्फ एक हादसे का विरोध नहीं था, बल्कि यह उस लापरवाह सिस्टम के खिलाफ एक खुली चेतावनी थी, जो अक्सर मासूमों की जान जाने के बाद ही अपनी गहरी नींद से जागता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक संवेदनशीलता को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया। जब पीड़ित परिवार और जनप्रतिनिधियों का हुजूम कलेक्ट्रेट पहुंचा, तो जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुर्सियों से नदारद थे। इस घोर संवेदनहीनता से नाराज होकर प्रदर्शनकारी कलेक्ट्रेट के मुख्य गेट पर ही धरने पर बैठ गए और 'प्रशासन मुर्दाबाद' के नारे गूंजने लगे। हालांकि, माहौल बिगड़ता देख कलेक्टर अर्पित वर्मा को खुद मौके पर आना पड़ा। उन्होंने जमीन पर बैठकर पीड़ित पिता का दर्द सुना और बाद में उन्हें खुद हाथ पकड़कर अपने चैंबर में ले गए। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या जनता को अपनी जायज मांगों और न्याय के लिए हमेशा इसी तरह सड़कों पर उतरकर सिस्टम को जगाना पड़ेगा? अधिकारियों की यह गैर-मौजूदगी उनकी जनता के प्रति जवाबदेही पर एक बड़ा सवालिया निशान है।

मासूम के पिता अभिषेक जैन ने जो आरोप लगाए हैं, वे बेहद गंभीर हैं और कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते हैं। पीड़ित पिता का सीधा आरोप है कि उनके बेटे की मौत महज़ एक हादसा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी, क्योंकि बस में जलने की गंध पहले से आ रही थी और आग लगते ही बस स्टाफ सवारियों को लावारिस छोड़कर भाग निकला। इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि जब एक पिता का कलेजा अपने जिगर के टुकड़े को खोकर छटपटा रहा था, तब हमारी 'मित्र पुलिस' उन्हें न्याय देने के बजाय तीन घंटे तक थाने में बैठाकर कागजी औपचारिकताएं पूरी कर रही थी। क्या पुलिस और परिवहन विभाग को ऐसी अनफिट बसों को सड़क पर दौड़ने की इजाजत देने से पहले मासूमों की सुरक्षा का ख्याल नहीं आना चाहिए था••? 

फिलहाल, कलेक्ट्रेट चैंबर में शिवपुरी विधायक देवेंद्र जैन, पोहरी विधायक कैलाश कुशवाह और कोलारस विधायक महेंद्र यादव की मौजूदगी में कलेक्टर ने पीड़ित परिवार को उचित कार्रवाई और न्याय का भरोसा दिलाया है। आश्वासन के बाद भले ही नारेबाजी शांत हो गई हो, लेकिन शिवपुरी की जनता के जेहन में सुलग रहे सवाल शांत नहीं हुए हैं। क्या इस मामले में दोषी बस संचालक और लापरवाह स्टाफ के खिलाफ ऐसी कठोर कार्रवाई होगी जो नजीर बन सके? या फिर हर बार की तरह इस बार भी मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? देखना यह है कि प्रशासन इस बार न्याय का गला घोंटने वाले दोषियों को सलाखों के पीछे भेजता है या फिर रसूखदारों के आगे घुटने टेक देता है।

कागजी फिटनेस और कमीशन के खेल ने ली मासूम की जान

इस पूरे हृदयविदारक हादसे ने परिवहन विभाग (RTO) की कार्यप्रणाली को पूरी तरह नंगा कर दिया है। पीड़ित पिता का यह आरोप कि 'बस में जलने की गंध पहले से आ रही थी', साफ इशारा करता है कि बस तकनीकी रूप से अनफिट थी। सवाल यह उठता है कि बिना जांच के ऐसी खटारा और खतरनाक वीडियो कोच बसों को फिटनेस सर्टिफिकेट कैसे दे दिया जाता है? क्या परिवहन विभाग के अधिकारियों की जिम्मेदारी सिर्फ दफ्तरों में बैठकर टैक्स वसूलने और अनफिट वाहनों को हरी झंडी देने तक सीमित है? चेकिंग के नाम पर महज खानापूर्ति करने वाले आरटीओ अमले ने अगर समय रहते इन बसों की सघन जांच की होती, तो आज एक हंसता-खेलता परिवार इस तरह तबाह न होता। जनता अब सीधे परिवहन विभाग के उन भ्रष्ट चेहरों पर सवाल उठा रही है, जिनकी लापरवाही के कारण सड़कें 'मौत का हाईवे' बन चुकी हैं।

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