कलेक्टर के खौप से साढ़े तीन घंटे तक जनसुनवाई में डटे रहे अधिकारी,पीड़ित को कुसी पर बिठालकर सुनी समस्या
पहली बार कलेक्टर के खौप से जनसुनवाई में नज़र आए कर्मचारियों कि जगह अधिकारी, साढ़े तीन घंटे तक सुनते रहे समस्या
शिवपुरी। जिले की कमान संभालते ही नवागत कलेक्टर अर्पित वर्मा के तेवर देखकर कलेक्ट्रेट का नजारा पूरी तरह बदला हुआ नजर आया। मंगलवार को हुई पहली जनसुनवाई में प्रशासन का वह चेहरा दिखाई दिया, जिसकी उम्मीद जनता सालों से कर रही थी। सबसे बड़ा सवाल उन अधिकारियों पर खड़ा हुआ है, जो पिछले लंबे समय से जनसुनवाई को महज एक 'औपचारिकता' मानकर अपने मातहत कर्मचारियों को भेज देते थे, लेकिन नए मुखिया के आते ही वे न केवल उपस्थित हुए बल्कि साढ़े तीन घंटे तक अपनी कुर्सियों से चिपके रहे।
कुर्सी का खौफ या जिम्मेदारी का अहसास?
इससे पहले पूर्व कलेक्टर रविंद्र कुमार चौधरी के समय जनसुनवाई आमतौर पर दोपहर 1 बजे तक सिमट जाती थी। विडंबना यह थी कि उस समय अधिकतर विभागाध्यक्ष (HODs) खुद आने के बजाय अपने बाबू या जूनियर कर्मचारियों को भेजकर खानापूर्ति करते थे।
लेकिन मंगलवार को तस्वीर जुदा थी:
• दिखे 'लापता' चेहरे: जनसुनवाई में कुछ ऐसे अधिकारी भी अपनी 'शक्ल' दिखाते नजर आए, जिन्हें जनता ने शायद ही पहले कभी जनसुनवाई के मंच पर देखा हो।
• साढ़े 3 घंटे का मैराथन: सुबह 11 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक चली इस सुनवाई में अधिकारी कलेक्टर के साथ मुस्तैदी से बैठे रहे। यह देख लोग भी चर्चा करते नजर आए कि 'जो अधिकारी अपने केबिन में 3 घंटे नहीं बैठते, वे आज कलेक्टर के डर से एक मिनट के लिए भी नहीं हिले।'
निराकरण की उम्मीद: फाइलों में दबी जनता की चीखें
कलेक्टर अर्पित वर्मा ने न केवल एक-एक पीड़ित की फरियाद को गंभीरता से सुना, बल्कि कुछ आवेदनों का मौके पर ही निराकरण करवाकर अधिकारियों को स्पष्ट संकेत दे दिए कि अब लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। उन्होंने अधिकारियों को सख्त लहजे में निर्देश दिए कि जनसुनवाई में आने वाली समस्याओं का निराकरण समय सीमा में होना चाहिए।
उठते कुछ गंभीर सवाल
1. प्रशासनिक निष्ठा पर सवाल: क्या अधिकारियों की सक्रियता केवल नए कलेक्टर के 'खौफ' तक सीमित है? क्या कलेक्टर के बदलते ही नियम और कर्तव्य बदल जाते हैं?
2. पुरानी कार्यशैली का जिम्मेदार कौन? पूर्व में जो अधिकारी जनसुनवाई से गायब रहते थे, उन पर अब तक लगाम क्यों नहीं कसी गई? क्या वे जनता के प्रति जवाबदेह नहीं थे?
3. क्या यह निरंतरता बनी रहेगी? बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सक्रियता सिर्फ 'पहली जनसुनवाई' के स्वागत तक है या आने वाले समय में भी अधिकारी इसी तरह पीड़ितों की बात सुनने के लिए मैदान में डटे रहेंगे?
खास बात: नवागत कलेक्टर के सख्त रवैये ने पीड़ितों में एक नई उम्मीद जगाई है, लेकिन अधिकारियों की यह 'अचानक जागी कर्तव्यनिष्ठा' उनके पुराने ढर्रे पर तमाचा भी है। अब देखना यह होगा कि कलेक्ट्रेट में शुरू हुआ यह सुधार कितने दिन टिकता है।


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