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एमपी पुलिस में अनुशासन पर सवाल? DGP के ट्रांसफर ऑर्डर के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचा ड्राइवर, अदालत ने लगाई रोक•••

शनिवार, 17 जनवरी 2026

एमपी पुलिस में अनुशासन पर सवाल? DGP के ट्रांसफर ऑर्डर के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचा ड्राइवर, अदालत ने लगाई रोक•••

टीकमगढ़/ग्वालियर: मध्य प्रदेश पुलिस विभाग में अनुशासन और प्रशासनिक आदेशों को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। आमतौर पर पुलिस विभाग में पुलिस महानिदेशक (DGP) के आदेश को पत्थर की लकीर माना जाता है, लेकिन टीकमगढ़ के एक पुलिस ड्राइवर ने इस परंपरा को चुनौती देते हुए सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

क्या है पूरा मामला?

मामला टीकमगढ़ जिले में पदस्थ आरक्षक चालक (Driver) राजेंद्र सिंह यादव के तबादले से जुड़ा है। हाल ही में पुलिस मुख्यालय (PHQ), भोपाल से DGP के हस्ताक्षरित आदेश के तहत राजेंद्र सिंह का तबादला टीकमगढ़ से ग्वालियर कर दिया गया था। पुलिस जैसे अनुशासित महकमे में सर्वोच्च अधिकारी के आदेश का पालन तत्काल प्रभाव से किया जाता है, लेकिन इस मामले में आरक्षक ने आदेश को मानने के बजाय उसे कानूनी चुनौती देना बेहतर समझा।

हाईकोर्ट में दी गई दलीलें

आरक्षक राजेंद्र सिंह यादव ने ग्वालियर हाईकोर्ट की खंडपीठ में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि:

1. यह स्थानांतरण तबादला नीति (Transfer Policy) के मानदंडों के विरुद्ध है।

2. आदेश जारी करने की प्रक्रिया में प्रक्रियात्मक खामियां (Procedural Lapses) हैं।

3. बिना किसी ठोस प्रशासनिक आधार के बीच सत्र में यह कार्रवाई की गई है।

अदालत का फैसला: DGP के आदेश पर लगा 'ब्रेक'

हाईकोर्ट ने याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए इसे गंभीरता से लिया। माननीय न्यायालय ने DGP के स्थानांतरण आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी है। कोर्ट ने राज्य शासन और पुलिस महानिदेशक कार्यालय को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इस स्टे के बाद अब आरक्षक को फिलहाल टीकमगढ़ से रिलीव नहीं किया जा सकेगा।

विवाद के पीछे की बड़ी वजह

यह मामला प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय इसलिए है क्योंकि

• अनुशासन बनाम अधिकार: पुलिस महकमे में DGP का पद सर्वोच्च होता है। एक आरक्षक का उनके आदेश के खिलाफ कोर्ट जाना विभाग के भीतर "चेन ऑफ कमांड" पर सवालिया निशान खड़े करता है।

• बढ़ती कानूनी जागरूकता: यह घटना दर्शाती है कि अब कर्मचारी केवल 'आदेश' को अंतिम नहीं मानते, बल्कि यदि उन्हें लगता है कि उनके साथ नियमों के विरुद्ध कार्रवाई हुई है, तो वे कानूनी उपचार लेने से पीछे नहीं हटते।

आगे क्या होगा?

अब अगली सुनवाई में मध्य प्रदेश शासन की ओर से जवाब पेश किया जाएगा। यदि विभाग यह साबित करने में विफल रहता है कि तबादला जनहित या प्रशासनिक आवश्यकता के तहत किया गया था, तो यह DGP कार्यालय के लिए एक बड़ी तकनीकी हार हो सकती है। फिलहाल, इस 'अनुशासन बनाम नियम' की जंग पर पूरे प्रदेश के पुलिसकर्मियों की नजर टिकी है।

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